धीरे -धीरे, धीरे-धीरे (सामाजिक कविता)
Social Poetry in Hindi on Life
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Motivational Poem in Hindi |
ढल रही है, हर जीवन की शाम ,
जीवन से मृत्यु को,
धीरे- धीरे , धीरे - धीरे ||
नादाँ या भयभीत है जग ,
जो कर रहा है, नादानियाँ ,
एवं समा रहा है , काल में,
धीरे- धीरे , धीरे - धीरे ||
हर इंसान ,
भूखा है, धन का ,
पी रहा है शोणित , एक - दूजे का,
फँस रहा है, अपनें ही जाल में ,
धीरे - धीरे , धीरे - धीरे ||
प्रति-पल , प्रति-क्षण, इसे चाहिए अभिप्रेरणा,
अंदर से हो रहा है , खोखला |
स्वयं को समझ नहीं पा रहा है, मूरख!
जो खुद के लिए , कफ़न बुन रहा है ,
धीरे- धीरे , धीरे - धीरे ||
जंगल काटे, मैली की, नदियाँ,
प्रकृति का बहुत नुकसान किया |
फूलों से भरे घर को अपने ,
बगिया से कब्रिस्तान किया|
मर रहा है, हर दिन और रात,अपने आप ||
धीरे- धीरे , धीरे - धीरे ||
सत्कर्म और मधुर वाणी,
इसका तनिक भी ज्ञान नहीं |
परपीड़ा क्या समझे , अँधा- व्यभिचारी ,
जिसका कोई सम्मान नहीं|
कुछ इस तरह से हर मानव की,
काली -अंधियारी आ रही है रात ,
बागान से श्मशान की तरफ अग्रसर है सब ,
धीरे- धीरे , धीरे - धीरे ||
© कवि आशीष उपाध्याय "एकाकी"
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
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